‘नो यूपीआई डे’ (No UPI Day) का ऐलान: क्या 2 अक्टूबर को बंद रहेंगी यूपीआई सेवाएं और क्या हैं नए नियम?

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नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा यूपीआई लेनदेन को लेकर नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फ्रेमवर्क की घोषणा के बाद देश में नया विवाद खड़ा हो गया है। इसे लेकर देश भर की प्रमुख व्यापारिक और व्यापारी संगठनों ने 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) को देशव्यापी ‘नो यूपीआई डे’ (No UPI Day) के रूप में मनाने का ऐलान किया है। व्यापारियों का विरोध इस बात को लेकर है कि 15 अक्टूबर से यूपीआई पेमेंट पर नया चार्ज लगने जा रहा है, जिसे लेकर व्यापारियों में रोष है।

क्या 2 अक्टूबर को पूरी तरह बंद रहेंगी यूपीआई सेवाएं?

नहीं, 2 अक्टूबर को यूपीआई (UPI) सेवाएं तकनीकी रूप से बंद या ठप नहीं रहेंगी। इसका मतलब यह है कि आप अपने बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर या अन्य लेन-देन कर पाएंगे। हालांकि, इस विरोध प्रदर्शन के तहत देश भर के व्यापारी और खुदरा विक्रेता (Retailers) अपनी दुकानों और प्रतिष्ठानों पर ‘नो UPI डे’ मनाएंगे। इसके तहत व्यापारी विरोध स्वरूप अपने क्यूआर कोड (QR Codes), स्कैनर, साउंड बॉक्स और डिजिटल पेमेंट मशीनों को काले कपड़े से ढक लेंगे और उस दिन ग्राहकों से यूपीआई के जरिए भुगतान स्वीकार न करने का आग्रह करेंगे।

यूपीआई चार्ज से जुड़े नए नियम और सरकार के दिशा-निर्देश (15 अक्टूबर से लागू)

सरकार और एनपीसीआई (NPCI) के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, 15 अक्टूबर से यूपीआई भुगतान प्रणाली में कुछ बदलाव लागू होने जा रहे हैं। आइए जानते हैं कि किस पर कितना चार्ज लगेगा और क्या व्यवस्था रहेगी:

1. आम ग्राहकों (Consumers) पर इसका क्या असर होगा?

  • ग्राहकों के लिए यूपीआई पूरी तरह फ्री रहेगा: आम उपभोक्ताओं (कस्टमर्स) को किसी भी तरह का कोई ट्रांजैक्शन चार्ज या MDR नहीं देना होगा। यदि आप किसी को पैसे भेजते हैं या दुकान पर भुगतान करते हैं, तो आपको कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं चुकाना होगा।
  • पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर पूरी तरह फ्री: एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को भेजे जाने वाले पैसे (P2P Transfers) पर पहले की तरह कोई शुल्क नहीं लगेगा, चाहे राशि कितनी भी हो।

2. मर्चेंट (व्यापारियों) के लिए क्या चार्ज तय किया गया है?

नए नियमों के मुताबिक, व्यापारियों (Merchants) के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का नया ढांचा तय किया गया है:

  • ₹2,000 से कम के भुगतान पर: यदि कोई ग्राहक मर्चेंट को ₹2,000 या उससे कम का भुगतान करता है, तो उस पर शून्य (Zero) MDR यानी कोई चार्ज नहीं लगेगा।
  • ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर: पात्र रेगुलर मर्चेंट (Person-to-Merchant या P2M) को ₹2,000 से ऊपर के लेन-देन पर 0.4% का MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) देना होगा।
  • अधिकतम सीमा (Cap): ₹75,000 या उससे अधिक के बड़े व्यावसायिक लेन-देन के लिए इस चार्ज की अधिकतम सीमा (Cap) ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन तय की गई है। यह चार्ज व्यापारियों को देना होगा, जिसे ग्राहकों से वसूले जाने की अनुमति नहीं है।

3. छोटे दुकानदारों और विशेष सेक्टर के लिए राहत:

  • छोटे व्यापारी (P2PM): ऐसे छोटे व स्थानीय दुकानदार जो यूपीआई के जरिए प्रति माह ₹1 लाख तक का भुगतान प्राप्त करते हैं, उन्हें पूरी तरह छूट दी गई है और उन पर जीरो-MDR लागू रहेगा।
  • विशेष श्रेणियां (रेलवे, फ्यूल, टेलीकॉम, बीमा): बीमा, पेट्रोल पंप (फ्यूल), टेलीकॉम और रेलवे जैसी कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर 0.4% के बजाय फ्लैट ₹5 का रियायती मर्चेंट चार्ज तय किया गया है।

व्यापारी विरोध क्यों कर रहे हैं?

व्यापारी संगठनों (जैसे ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रिब्यूटर्स फेडरेशन और अन्य क्षेत्रीय चैंबर ऑफ कॉमर्स) का कहना है कि वे बहुत कम मार्जिन पर काम करते हैं। डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने में उनका भी बड़ा योगदान रहा है, ऐसे में सरकार या पेमेंट सिस्टम द्वारा उन पर MDR चार्ज का बोझ डालना उनके मुनाफे को प्रभावित करता है। इसी के विरोध में उन्होंने 2 अक्टूबर को सांकेतिक रूप से ‘नो यूपीआई डे’ मनाने का फैसला किया है।

निष्कर्ष (Conclusion)

डिजिटल भुगतान आज भारत की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, जिसने छोटे से छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारियों तक लेन-देन को बेहद आसान बना दिया है। हालांकि, नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और शुल्क नियमों को लेकर व्यापारियों और भुगतान प्रणाली के बीच उपजा असंतोष इस बात की याद दिलाता है कि तकनीकी प्रगति और आर्थिक व्यवहारिकता के बीच संतुलन होना कितना जरूरी है।

2 अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ के रूप में विरोध प्रदर्शन और व्यापारियों द्वारा क्यूआर कोड को ढकना यह साफ करता है कि कारोबारी अपने मुनाफे और मार्जिन को लेकर गंभीर चिंता में हैं। सरकार, एनपीसीआई (NPCI) और व्यापारी संगठनों के बीच संवाद और उचित समाधान ही इस गतिरोध को खत्म कर सकता है। अंततः, एक ऐसी पारदर्शी और व्यावहारिक व्यवस्था की आवश्यकता है जो डिजिटल इंडिया के विकास को भी गति दे और देश के छोटे-मोटे दुकानदारों व व्यापारियों के हितों की भी रक्षा कर सके।

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